१७० ][ श्री जिनेन्द्र
जो अहिक्षेत्र विधान पढै नित अथवा गाय सुनावै,
श्री जिनभक्ति धरै मनमें दिढ, मनवांछित फल पावै;
जुगल वेद वसु एक अंग गणि, बुधजन वत्सर जान्यो,
मारग शुकल दशै रविसागर, ‘आशाराम’ बखान्यो. २०
श्री वृषभजिन – स्तवन
(वधाई)
लिया ॠषभदेव अवतार, निरत सुरपतिने कियो आके,
निरत कियो आके, हरषाके, प्रभुजीके दश भव दरशाके.
सरर सरर कर सारंगी तंबूरा बाजे,
नाचे पोरी पोरी मटकाके. टेक.
प्रथम प्रकाशी वाने इन्द्रजाल विद्या ऐसी,
आजलौं जगतमें सुनी न कहूं देखी तैसी.
आयो वह छबीलो चटकीलो है मुकुट बांध,
छम्म देसी फूदो मानों आ – कूदो पूनमको चांद.
मनको हरत गत फरत प्रभुको पूजै धरनीको शिर नाके. १
भुजौं पै चढाये हैं हजारों देव देवी तानैं,
हाथोंकी हथेलीमें जमाये हैं अखाडे तानैं,
ताधिन्ना ताधिन्ना तबला किटकिट धित्ता उनकी प्यारी लागे,
धुमकिट धुमकिट बाजा बाजे नाचे प्रभुके आगे,
सैनामें रिझावै तिरछी एड लगावे उडजावे भजन गाके. २
छिनमें जा वंदे वो तो नंदीश्वर द्वीप आप,
पांचो मेर वंदे आ मृदंग पै लगावै थाप;