स्तवनमाळा ][ १६९
दिव्य वचन सब भाषा गर्भित, खिरहि त्रिकाल सुवानी,
‘आसा’ आस करे सो पूरण, श्री पारस सुखदानी. १४
सुर नर जिय तिरयंच घनेरे, जिन वंदन चित आनै,
वैरभाव परिहार निरन्तर, प्रीति परस्पर ठानै;
दशहूं दिशि निरमल अति दीखै, भयो है शोभ घनेरा,
स्वच्छ सरोवर जलकल पूरे, वृक्ष फिरें चहु फेरा. १५
साली आदिक खेत चहूंदिशि, भई स्वमेव घनेरी,
जीवन वध नहिं होय कदाचित, यह अतिशय प्रभुकेरी;
नख अरु केश बढें नहिं प्रभुके, नहिं नैंनन टमकारे,
दर्पणवत प्रभुको तन दीपै, आनन चार निहारे. १६
इन्द्र नरेंद्र धनेंद्र सबे मिलि धर्मामृत अभिलाषी,
गणधर पद शिर नाय सुरासुर प्रभुकी थुति अभिलाषी;
दीनदयाल कृपाल दयानिधि; तृषावंत भवि चीन्हें,
धर्मामृत वर्षाय जिनेश्वर, तोषित बहु विधि कीन्हें. १७
आरज खंड विहार जिनेश्वर कीनों भविहितकारी,
धर्मचक्र आगौनि चलै प्रभु, केवल महिमा भारी;
पन्द्रह पांति कमल पन्द्रह जुग, सुंदर हेम सम्हारे,
अंतरीक्ष डग सहित चलैं प्रभु, चरणाम्बुज जल धारे. १८
केवल लहि उपसर्ग मिटे प्रभु, भूमि पवित्र सुहाई,
सो अहिक्षेत्र थाप्यो सुर नर मिल, पूजनको सुखदाई;
नाम लेत सब विघन विनाशै, संकट क्षणमें चूरै,
वंदन करत बढै सुख संपत्ति, सुमिरत आशा पूरै. १९