१६८ ][ श्री जिनेन्द्र
खेवैं देव गलिनमें घट भरि धूप सुगन्ध सुहाई,
मंद सुगन्ध प्रताप पवनवन, दशहूं दिशि एं छाई;
गरुडादिकके चिन्ह अलंकृत ध्वज चहुं ओर विराजै,
तोरन वंदनवारी सोहै नवनिधिकी छबि छाजै. ९
देवी देव खडे दरवानी, देखि बहुत सुख पावै,
सम्यक्वंत महाश्रद्धानी भविसों प्रीति बढावै;
तीन कोटिके मध्य जिनेश्वर गन्धकुटी सुखदाई,
अंतरीक्ष सिंहासन उपर, राजै त्रिभुवन राई. १०
मणिमय तीन सिंहासन शोभा, वरणत पार न पाऊं,
प्रभुके चरणकमलतल शोभे, मनमोदित सिर नाऊं;
चन्द्रकांतिसम दीप्ति मनोहर, तीन छत्र छबि आखी,
तीन भुवन इश्वर ताके हैं, मानों वे सब साखी. ११
दुन्दुभि शब्द गहिर अति बाजै, उपमा वरनि न जाई,
तीन भुवन जीवन प्रति भाखें जयघोषण सुखदाई;
कल्पतरू वसु पुष्प सुगन्धित गंधोदककी वर्षा,
देवी देव करें निशिवासर, भवि जीवन मन हर्षा. १२
तरु अशोक की उपमा वरणत भविजन पार न पावै,
रोग वियोग दुखी जन दर्शत, तुरतहिं शोक नशावै;
कुन्दपुहुप सम श्वेत मनोहर, चौसठ चमर ढुराहीं.
मानों निरमल सुरगिरिके तट, झरना झमकि झराहीं. १३
प्रभुतन श्री भामंडलकी द्युति, अद्भुत तेज विराजै,
जाकी दीप्ति मनोहर आगे, कोटि दिवाकर लाजै;