Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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स्तवनमाळा ][ १६७
भीषण रूप भयानक द्रग कर, अरुण वरण तन कांपै,
मूसलधारासम जल छोडै, अधर डशत तल चांपै.
अति अंधियार भयानक निशि अति गर्ज घटा घनघोरै,
चपला चपल चमकती चहुंदिशि, धीर न धीरज छोरै;
शब्द भयंकर करत असुर गण, अग्निजाल मुख छोडै,
पवन प्रचंड चलाय प्रलय सम द्रुमगण तृणसम तोडै.
पवन प्रचंड मूसल जलधारा, निशि अतिही अंधियारी,
दामिन दमक चिकार पिशाचन, वन कीनो भयकारी;
अविचल घोर गंभीर जिनेश्वर, थिर आसन वन ठांढे,
पवन परीषहसों नहि कांपै सुरगिरि सम मन गाढे.
प्रभुके पुण्यप्रताप पवन वश, फणपति आसन कंप्यो,
अति भयभीत विलोक चहूंदिसि, चक्ति व्है मन जंप्यो;
जाण्यो प्रभु उपसर्ग अवधिबल पद्मावतिजुत धायो,
फणको छत्र कियो प्रभुके शिर, सर्वारिष्ट नशायो.
फणिपतिकृत उपसर्ग निवारण देखि असुर दुठ भाग्यो,
लोकालोक विलोकन प्रभुके, तुरतहिं केवल जाग्यो;
समवशरण की रचना कारण, सुरपति आज्ञा दीनी,
मणिमुक्ता हीराक चनमय, धनपति रचना कीनी.
तीनों कोट रचे मन मंडित धूलीशाल बनाई,
गोपुर तुंग अनूप विराजै, मणिमय गहरी खाई;
सरवर सजल मनोहर सोहैं, वन उपवनकी शोभा,
वापी विविध विचित्र विलोकत सुर नर खग मनलोभा.