स्तवनमाळा ][ १६७
भीषण रूप भयानक द्रग कर, अरुण वरण तन कांपै,
मूसलधारासम जल छोडै, अधर डशत तल चांपै. ३
अति अंधियार भयानक निशि अति गर्ज घटा घनघोरै,
चपला चपल चमकती चहुंदिशि, धीर न धीरज छोरै;
शब्द भयंकर करत असुर गण, अग्निजाल मुख छोडै,
पवन प्रचंड चलाय प्रलय सम द्रुमगण तृणसम तोडै. ४
पवन प्रचंड मूसल जलधारा, निशि अतिही अंधियारी,
दामिन दमक चिकार पिशाचन, वन कीनो भयकारी;
अविचल घोर गंभीर जिनेश्वर, थिर आसन वन ठांढे,
पवन परीषहसों नहि कांपै सुरगिरि सम मन गाढे. ५
प्रभुके पुण्यप्रताप पवन वश, फणपति आसन कंप्यो,
अति भयभीत विलोक चहूंदिसि, चक्ति व्है मन जंप्यो;
जाण्यो प्रभु उपसर्ग अवधिबल पद्मावतिजुत धायो,
फणको छत्र कियो प्रभुके शिर, सर्वारिष्ट नशायो. ६
फणिपतिकृत उपसर्ग निवारण देखि असुर दुठ भाग्यो,
लोकालोक विलोकन प्रभुके, तुरतहिं केवल जाग्यो;
समवशरण की रचना कारण, सुरपति आज्ञा दीनी,
मणिमुक्ता हीराक चनमय, धनपति रचना कीनी. ७
तीनों कोट रचे मन मंडित धूलीशाल बनाई,
गोपुर तुंग अनूप विराजै, मणिमय गहरी खाई;
सरवर सजल मनोहर सोहैं, वन उपवनकी शोभा,
वापी विविध विचित्र विलोकत सुर नर खग मनलोभा. ८