Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६६ ][ श्री जिनेन्द्र
त्रिलोकीका जेता मदनभट जो दुर्जय महा,
युवावस्थामें भी वह दलित कीना स्वबलसे;
प्रकाशी मुक्तिके, अति सु सुखदाता जिनविभू. महावीर०
महा मोहव्याधी, हरण करता वैद्य सहज,
विना इच्छा बंधू, प्रथित जगकल्याण करता;
सहारा भव्यों को सकल जगमें उत्तम गुणी,
महावीरस्वामी दरश हमको दें प्रगट वे. महावीर०
संस्कृत वीराष्टक रच्यो, भागचंद रुचिवान,
तस भाषा अनुवाद यह, पढि पावै निर्वान.
श्री पार्श्वनाथ जिनस्तवन
(रागजोगीरास)
वंदौं श्री पारसपदपंकज, पंच परम गुरु ध्याऊं,
शारद माय नमों मनवचतन गुरु गौतम शिर नाऊं;
एक समय श्रीपारस जिनवर वन तिष्ठे वैरागी,
बाह्याभ्यंतर परिग्रह त्यागे आतमसों लव लागी.
कल्पद्रुमसम प्रभुतन सोहै करपल्लव तन साखा,
अविचल आतम ध्यान पगे, प्रभु ईक् चितमन थिर राखा;
मातातात कमठचर पापी, तपसी तप करि मूवो,
अज्ञानी अज्ञान तपस्या बल करि सो सुर हूवो.
मारग जात विमान रह्यो थिर, कोप अधिक मन ठान्यो,
देखत ध्यानारूढ जिनेश्वर, शत्रु आपनो मान्यो;