१६६ ][ श्री जिनेन्द्र
त्रिलोकीका जेता मदनभट जो दुर्जय महा,
युवावस्थामें भी वह दलित कीना स्वबलसे;
प्रकाशी मुक्तिके, अति सु सुखदाता जिनविभू. महावीर० ७
महा मोहव्याधी, हरण करता वैद्य सहज,
विना इच्छा बंधू, प्रथित जगकल्याण करता;
सहारा भव्यों को सकल जगमें उत्तम गुणी,
महावीरस्वामी दरश हमको दें प्रगट वे. महावीर० ८
संस्कृत वीराष्टक रच्यो, भागचंद रुचिवान,
तस भाषा अनुवाद यह, पढि पावै निर्वान.
श्री पार्श्वनाथ जिन – स्तवन
(राग – जोगीरास)
वंदौं श्री पारसपदपंकज, पंच परम गुरु ध्याऊं,
शारद माय नमों मनवचतन गुरु गौतम शिर नाऊं;
एक समय श्रीपारस जिनवर वन तिष्ठे वैरागी,
बाह्याभ्यंतर परिग्रह त्यागे आतमसों लव लागी. १
कल्प – द्रुमसम प्रभुतन सोहै करपल्लव तन साखा,
अविचल आतम ध्यान पगे, प्रभु ईक् चितमन थिर राखा;
माता – तात कमठचर पापी, तपसी तप करि मूवो,
अज्ञानी अज्ञान तपस्या बल करि सो सुर हूवो. २
मारग जात विमान रह्यो थिर, कोप अधिक मन ठान्यो,
देखत ध्यानारूढ जिनेश्वर, शत्रु आपनो मान्यो;