Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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स्तवनमाळा ][ १६५
महावीराष्टक
जिन्होंकी प्रज्ञामें, मुकुरसम चैतन्य जड भी,
स्थितिव्ययोत्पत्ति युत झलकते साथ सब ही;
जगतज्ञाता ज्ञान प्रगट करता सूर्यसम जो,
महावीरस्वामी दरश हमकों दें प्रगट वे.
जिन्होंके दो चक्षु पलक अरु लाली रहित हो,
जनोंको दर्शाते, हृदयगत क्रोधातिलय को;
जिन्होंकी शान्तात्मा अतिविमलमूर्ति स्पुटमहा. महावीर०
नमंते इन्द्रोंके, मुकुटमणिकी कान्ति धरता,
जिन्होंके चरणोंका युग, ललित संतप्त जनको;
भवाग्निका हर्ता, स्मरण करते ही सुजल है. महावीर०
जिन्होंकी पूजासे, मुदित-मन हो मेंढक जबै,
हुआ स्वर्गी, ताही समय गुणधारी अतिसुखी;
लहैं जो मुक्तिके सुख भुगतता विस्मय कहा? महावीर०
तपे सोने ज्यों भी, रहित वपुसे, ज्ञानगृह हैं,
अकेले नाना भी, नृपतिवर सिद्धार्थसुत है;
न जन्मे भी श्रीमान्, भवरत नहीं अद्भुतगती. महावीर०
जिन्होंकी वाग्गंगा, अमल नयकल्लोल धरती,
न्हवाती लोगोंको, सुविमल महा ज्ञानजलसे;
अभी भी सेते हैं, बुधजन महाहंस जिसको. महावीर०