स्तवनमाळा ][ १७३
श्रीमत वादिराज मुनिवरसों, कह्यो कुष्टि भूपति जिह बार,
श्रावक सेठ कह्यो तिहं अवसर, मेरे गुरु कंचन तन धार;
तब ही एकीभाव रच्यौ गुरु, तन सुवर्णदुति भयो अपार; सो० ६
श्रीमत कुमुदचन्द्र मुनिवरसों, वाद पर्यो जहं सभा मंझार,
तब ही श्रीकल्यानधामथुति श्रीगुरु रचना रची अपार;
तब प्रतिमा श्रीपार्श्वनाथकी, प्रगट भई त्रिभुवन जयकार सो० ७
श्रीमत अभयचंद्र गुरुसों जब, दिल्लीपति इमि कही पुकार,
कै तुम मोहि दिखावहुं अतिशय, कै पकरौ मेरो मत सार,
तब गुरु प्रगट अलौकिक अतिशय, तुरत हर्यो ताको मदभार,
सो गुरुदेव बसो उर मेरे विघनहरन मंगलकरतार. ८
श्री स्तवन
(दोहा)
त्रिभुवन आनंदकारी जिन छबि, थारी नैन निहारी. टेक.
ज्ञान अपूरव उदय भयौ अब, या दिनकी बलिहारी,
मो उर मोद बढ्यौ जु नाथ सो, कथा न जात उचारी. त्रि० १
सुन घनघोर मोरमुद ओर न, ज्यों निधि पाय भिखारी,
जाहि लखत झट झरत मोहरज, होय सो भवि अविकारी. त्रि० २
जाकी सुंदरता सु पुरन्दर, शोभ लजावनहारी,
निज अनुभूति सुधाछबि पुलकित, वदन मदन अरिहारी. त्रि०३
शूल दुकूल न बाला माला, मुनिमनमोद – प्रसारी,
अरुन न नैनन सैन भ्रमै ना, बंक न लंक सम्हारी. त्रि० ४