१७४ ][ श्री जिनेन्द्र
तातैं विधिविभाव क्रोधादि न, लखियत हे जगतारी,
पूजत पातकपुंज पलावत, ध्यावत शिवविस्तारी. त्रि० ५
कामधेनु सुरतरु चिंतामनि, इकभव सुखकरतारी,
तुम छवि लखत मोदतैं जो सुर, सो तुम पद दातारी. त्रि० ६
महिमा कहत न लहत पार सुर – गुरुहूकी बुधि हारी,
और कहै किम दौल चहै इम, देहु दशा तुम धारी. त्रि० ७
दर्शन स्तुति
(दोहा)
विश्वभावव्यापी महा, एक विमल चिद्रूप;
ज्ञानानंदमयी सदा, जयवन्तौ जिनभूप. १
(छन्द चाल)
सफली मम लोचन द्वंद, देखत तुमको जिनचन्द,
मम तनमन शीतल एम, अमृतरस सींचत जेम. २
तुम बोध अमोघ अपारा, दर्शन पुनि सर्व निहारा,
आनंद अतीन्द्रिय राजै, बल अतुल स्वरूप न त्याजै. ३
इत्यादिक स्वगुन अनंता, अंतर्लक्ष्मी भगवंता,
बाहिज विभूति बहु सोहै, वरनन समर्थ कवि को है. ४
तुम वृच्छ अशोक सुस्वच्छ, सब शोक हरनको दच्छ,
तहां चंचरीक गुंजारैं, मानों तुम स्तोत्र उचारैं. ५
शुभ रत्नमयूख विचित्र, सिंहासन शोभ पवित्र,
तहं वीतराग छबि सोहै, तुम अंतरीछ मन मोहै. ६