Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 174 of 253
PDF/HTML Page 186 of 265

 

background image
१७४ ][ श्री जिनेन्द्र
तातैं विधिविभाव क्रोधादि न, लखियत हे जगतारी,
पूजत पातकपुंज पलावत, ध्यावत शिवविस्तारी. त्रि०
कामधेनु सुरतरु चिंतामनि, इकभव सुखकरतारी,
तुम छवि लखत मोदतैं जो सुर, सो तुम पद दातारी. त्रि०
महिमा कहत न लहत पार सुरगुरुहूकी बुधि हारी,
और कहै किम दौल चहै इम, देहु दशा तुम धारी. त्रि०
दर्शन स्तुति
(दोहा)
विश्वभावव्यापी महा, एक विमल चिद्रूप;
ज्ञानानंदमयी सदा, जयवन्तौ जिनभूप.
(छन्द चाल)
सफली मम लोचन द्वंद, देखत तुमको जिनचन्द,
मम तनमन शीतल एम, अमृतरस सींचत जेम.
तुम बोध अमोघ अपारा, दर्शन पुनि सर्व निहारा,
आनंद अतीन्द्रिय राजै, बल अतुल स्वरूप न त्याजै.
इत्यादिक स्वगुन अनंता, अंतर्लक्ष्मी भगवंता,
बाहिज विभूति बहु सोहै, वरनन समर्थ कवि को है.
तुम वृच्छ अशोक सुस्वच्छ, सब शोक हरनको दच्छ,
तहां चंचरीक गुंजारैं, मानों तुम स्तोत्र उचारैं.
शुभ रत्नमयूख विचित्र, सिंहासन शोभ पवित्र,
तहं वीतराग छबि सोहै, तुम अंतरीछ मन मोहै.