स्तवनमाळा ][ १७५
वर कुंद कुंद अवदात, चामरव्रज सर्व सुहात,
तुम ऊपर मधवा ढारै, धर भक्ति भाव अघ टारै. ७
मुक्ताफल माल समेत, तुम ऊर्ध्व छत्रत्रय सेत,
मानों तारान्वित चंद, त्रय मूर्ति धरी दुति वृन्द. ८
शुभ दिव्य पटह बहु बाजैं, अतिशय जुत अधिक विराजैं,
तुमरो जस द्यौकैं मानौं, त्रैलोक्यनाथ यह जानौं. ९
हरिचंदन सुमन सुहाये, दशदिशि सुगंधि महकाये,
अलिपुंज विगुंजत जामैं, शुभ वृष्टि होत तुम सामैं. १०
भामंडल दीप्ति अखंड, छिप जात कोट मार्तंड,
जगलोचनको सुखकारी, मिथ्यातम पटल निवारी. ११
तुमरी दिव्यध्वनि गाजै, बिन इच्छा भविहित काजै,
जीवादिक तत्त्व प्रकाशी, भ्रमतमहर सूर्य – कलासी. १२
इत्यादि विभूति अनंत, बाहिज अतिशय अरहंत,
देखत मन भ्रमतम भागा, हित अहित ज्ञान उर जागा. १३
तुम सब लायक उपगारी, मैं दीन दुखी संसारी,
तातैं सुनिये यह अरजी, तुम शरण लियो जिनवरजी. १४
मैं जीव द्रव्य विन अंग, लागो अनादि विधि संग,
ता निमित्त पाय दुख पायें, हम मिथ्यातादि महा ये. १५
निजगुण कबहूं नहि भाये, सब परपदार्थ अपनाये,
रति अरति करी सुखदुखमें, ह्वै करि निजधर्म विमुखमैं. १६
पर – चाह – दाह नित दाहौ, नहिं शांति-सुधा अवगाहौ,
पशु नारक नर सुरगतमें, चिर भ्रमत भयो भ्रमतममें. १७