Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७६ ][ श्री जिनेन्द्र
कीनें बहु जामन मरना, नहिं पायो साचो शरना,
अब भाग उदय मम आयो, तुम दर्शन निर्मल पायो. १८
मन शांत भयो उर मेरो, बाढो उछाह शिवकेरो,
पर विषय रहित आनन्द, निज रस चाखो निरद्वंद. १९
मुझ काजतनें कारज हो, तुम देव तरनतारन हो,
तातैं एसी अब कीजे, तुम चरमभक्ति मोहि दीजे. २०
द्रगज्ञानचरन परिपूर, पाऊं निश्चय भवचूर.
दुखदायक विषय कषाय, इनमें परनति नहिं जाय. २१
सुरराज समाज न चाहों, आतमसमाधि अवगाहों,
पर इच्छा तो मनमानी, पूरो सब केवलज्ञानी. २२
(दोहा)
गनपति पार न पावहीं, तुम गुनजलधि विशाल,
भागचन्द तुव भक्ति ही, करै हमैं वाचाल. २३
हार्दिक भावना
मैं वो दिन कब पाऊं, घरको छोड बन जाऊं; मैं वो०
अंतर बाहिर त्याग परिग्रह, नग्न स्वरूप बनाऊं; मैं वो०
सकल विभावमयी परिणति तज, स्वाभाविक चित लाऊं; मैं वो०
पर्वत गुफा नगर सुन्दर धर, दीपक चांद मनाऊं; मैं वो०
भूमि सेज आकाश चंदोवा तकिया भुजा लगाउं; मैं वो०
उपल जान मृग खाज खुजावत, ऐसा ध्यान लगाऊं;
मैं. वो०