स्तवनमाळा ][ १७७
क्षुधा तृषादिक सहूं परीषह, बारह भावन भाऊं; मैं वो०
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण तप, दशलक्षण उर लाऊं; मैं वो०
चार घातिया कर्म नाशकर, केवलज्ञान उपाऊं; मैं वो०
घात अघाति लहूं शिव ‘मकखन’, फेर न जगमें आउं; मैं वो०
❑
श्री सिद्ध – स्तुति
नमौं सिद्ध परमात्मा, अद्भुत परम रसाल,
तिन गुण अगम अपार है, सरस रचों जयमाल. १
(छन्द पद्धरी)
जय जय श्रीसिद्धनको प्रणाम,
जय शिवसुख – सागरके सुधाम;
जय बलि बलि जात सुरेश जान,
जय पूजत तनमन हरष आन. २
जय क्षायक गुण सम्यक्त्व लीन,
जय केवलज्ञान सुगुण नवीन;
जय लोकालोक प्रकाशवान,
जय केवल — अतिशय हिये आन. ३
जय सर्व तत्त्व दरसे महान,
सोई दरसनगुण तीजो सुजान;
जय वीर्य अनंतो है अपार,
जाकी पटतर दूजो न सार. ४