१७८ ][ श्री जिनेन्द्र
जय सूक्षमता गुण हिये धार,
सब ज्ञेय लखें एक हि सुवार;
इक सिद्धमें सिद्ध अनन्त जान,
अपनी अपनी सत्ता प्रमान. ५
अवगाहन गुण अतिशय विशाल,
तिनके पद बंदौं नमत भाल;
कछु घाटि न बाध कहै प्रमान,
सो अगुरुलघु गुण धर महान. ६
जय बाधारहित विराजमान,
सो अव्याबाध कह्यो बखान;
ए वसु गुण हैं विवहार संत,
निहचै जिनवर भाखे अनंत. ७
सब सिद्धनके गुण कहे गाय,
इन गुणकर शोभित हैं जिनाय;
तिनको भविजन मन वचन काय,
पूजत वसुविधि अति हरष लाय. ८
सुरपति फणपति चक्री महान,
बलहरि प्रतिहर मनमथ सुजान;
गणपति मुनिपति मिलि धरत ध्यान,
जय सिद्ध शिरोमणि जग प्रधान. ९
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