Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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स्तवनमाळा ][ १७९
समाधिामरण
(कविवर सूरचन्द्रजीकृत बडा समाधिमरण)
बन्दौं श्रीअरहंत परमगुरु, जो सबको सुखदाई;
इस जगमें दुःख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई.
अब मैं अरज करुँ प्रभु तुमसे, कर समाधि उर मांही;
अंत समय में यह वर मांगूँ, सो दीजै जग-राई.
भव-भवमें तन धार नये मैं, भव-भव शुभ संग पायो;
भव-भवमें नृप-रिद्धि लई मैं, मात पिता सुत थायो.
भव-भवमें तन पुरुष-तनों धर, नारी हूँ तन लीनो;
भव-भवमें मैं भयो नपुंसक, आतमगुण नहि चीनो.
भव-भवमें सुर-पदवी पाई, ताके सुख अति भोगे;
भव-भवमें गति नरकतनी धर, दुःख पाये विधियोगे.
भव-भवमें तिर्यंच योनि धर, पायो दुख अति भारी;
भव-भवमें साधर्मी जन को, संग मिल्यो हितकारी.
भव-भवमें जिन-पूजन कीनी, दान सुपात्रहि दीनो;
भव-भवमें मैं सवसरणनमें, देख्यो जिनगुन भीनो.
एती वस्तु मिली भव-भव में, ‘सम्यक्’ गुन नहिं पायो;
ना समाधियुत मरण कियो मैं, तातैं जग भरमायो.
काल अनादि भयो जग भ्रमतैं, सदा कु-मरन हि कीनो;
एक बारहू ‘सम्यक्’ युत मैं, निजआतम नहिं चीनो.
जो निजपरको ज्ञान होय तो, मरण समय दुःख कांई;
देह विनाशी, मैं निजभासी, जोतिस्वरूप सदाई.