स्तवनमाळा ][ १७९
समाधिामरण
(कविवर सूरचन्द्रजीकृत बडा समाधिमरण)
बन्दौं श्रीअरहंत परमगुरु, जो सबको सुखदाई;
इस जगमें दुःख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई.
अब मैं अरज करुँ प्रभु तुमसे, कर समाधि उर मांही;
अंत समय में यह वर मांगूँ, सो दीजै जग-राई. १
भव-भवमें तन धार नये मैं, भव-भव शुभ संग पायो;
भव-भवमें नृप-रिद्धि लई मैं, मात पिता सुत थायो.
भव-भवमें तन पुरुष-तनों धर, नारी हूँ तन लीनो;
भव-भवमें मैं भयो नपुंसक, आतमगुण नहि चीनो. २
भव-भवमें सुर-पदवी पाई, ताके सुख अति भोगे;
भव-भवमें गति नरकतनी धर, दुःख पाये विधियोगे.
भव-भवमें तिर्यंच योनि धर, पायो दुख अति भारी;
भव-भवमें साधर्मी जन को, संग मिल्यो हितकारी. ३
भव-भवमें जिन-पूजन कीनी, दान सुपात्रहि दीनो;
भव-भवमें मैं सवसरणनमें, देख्यो जिनगुन भीनो.
एती वस्तु मिली भव-भव में, ‘सम्यक्’ गुन नहिं पायो;
ना समाधि – युत मरण कियो मैं, तातैं जग भरमायो. ४
काल अनादि भयो जग भ्रमतैं, सदा कु-मरन हि कीनो;
एक बारहू ‘सम्यक्’ युत मैं, निज – आतम नहिं चीनो.
जो निज – परको ज्ञान होय तो, मरण समय दुःख कांई;
देह विनाशी, मैं निज – भासी, जोति – स्वरूप सदाई. ५