Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८० ][ श्री जिनेन्द्र
विषयकषायनके वश ह्वैकें, देह आपनो जान्यो;
कर मिथ्या सरधान हिये बिच, आतम नाहिं पिछान्यो.
यों क्लेश हिय धार मरण करि, चारों गति भरमायो;
सम्यक्दर्शनज्ञानचरन ये, हिरदेमें नहि लायो.
अब यह अरज करूं प्रभु सुनिये, मरण समय यह मांगौं;
रोग जनित पीडा मत होवो, अरु कषाय मत जागौ.
ये मुझ मरन सयम दुखदाता, इन हर साता कीजै;
जो समाधियुत मरन होय मुझ, अरु मिथ्या गद छीजै.
यह तन सात कुधातमयी है, देखत ही घिन आवै;
चर्मलपेटी उपर सोहै, भीतर विष्ठा पावै.
अति दुर्गन्ध अपावन सा यह, मूरख प्रीति बढावै;
देह विनासी, जिय अविनासी, नित्य स्वरूप कहावै.
यह तन जीर्ण कुटी सम आतम, यातैं प्रीति न कीजै;
नूतन महल मिलै जब भाई, तब यामे क्या छीजे.
मृत्यु होनसे हानि कौन है, याको भय मत लावो;
समता से जो देह तजोगे, तो शुभ तन तुम पावो.
मृत्यु मित्र उपकारी तेरो, इस अवसर के मांही;
जीरन तन से देत नयो यह, या सम साहू नाही.
या सेती इस मृत्यु समय पर, उत्सव अति ही कीजै;
क्लेशभावको त्याग सयाने, समताभाव धरीजै. १०
जो तुम पूरव पुण्य किये हैं, तिनको फल सुखदाई;
मृत्युमित्र बिन कौन दिखावै, स्वर्गसम्पदा भाई.