१८० ][ श्री जिनेन्द्र
विषय – कषायनके वश ह्वैकें, देह आपनो जान्यो;
कर मिथ्या सरधान हिये बिच, आतम नाहिं पिछान्यो.
यों क्लेश हिय धार मरण करि, चारों गति भरमायो;
सम्यक्दर्शन – ज्ञान – चरन ये, हिरदेमें नहि लायो. ६
अब यह अरज करूं प्रभु सुनिये, मरण समय यह मांगौं;
रोग जनित पीडा मत होवो, अरु कषाय मत जागौ.
ये मुझ मरन सयम दुखदाता, इन हर साता कीजै;
जो समाधियुत मरन होय मुझ, अरु मिथ्या गद छीजै. ७
यह तन सात कुधात – मयी है, देखत ही घिन आवै;
चर्म – लपेटी उपर सोहै, भीतर विष्ठा पावै.
अति दुर्गन्ध अपावन सा यह, मूरख प्रीति बढावै;
देह विनासी, जिय अविनासी, नित्य स्वरूप कहावै. ८
यह तन जीर्ण कुटी सम आतम, यातैं प्रीति न कीजै;
नूतन महल मिलै जब भाई, तब यामे क्या छीजे.
मृत्यु होनसे हानि कौन है, याको भय मत लावो;
समता से जो देह तजोगे, तो शुभ तन तुम पावो. ९
मृत्यु मित्र उपकारी तेरो, इस अवसर के मांही;
जीरन तन से देत नयो यह, या सम साहू नाही.
या सेती इस मृत्यु समय पर, उत्सव अति ही कीजै;
क्लेश – भावको त्याग सयाने, समता – भाव धरीजै. १०
जो तुम पूरव पुण्य किये हैं, तिनको फल सुखदाई;
मृत्यु – मित्र बिन कौन दिखावै, स्वर्ग – सम्पदा भाई.