स्तवनमाळा ][ १८१
राग – रोषको छोड सयाने, सात व्यसन दुखदाई;
अन्तसमय में समता धारो, पर – भव – पंथ सहाई. ११
कर्म महादुठ बैरी मेरो, ता सेती दुख पावै;
तन – पिंजरमें बन्ध कियो मोहि, यासों कौन छुडावै.
भूख – तृषा दुख आदि अनेकन, इस ही तन में गाढै;
मृत्यु – राज अब आय दयाकर, तन पिंजरसों काढै. १२
नाना वस्त्राभूषण मैंने, इस तनको पहराये;
गंध सुगंधित अत्तर लगाये, षट्रस अशन कराये.
रात दिना मैं दास होय कर, सेव करी तन केरी;
सो तन मेरे काम न आयो, भूल रह्यो निधि मेरी. १३
मृत्यु – राय को सरन पाय, तन नूतन एसो पाऊं;
जामे सम्यक्रतन तीन लहि, आठों कर्म खपाऊं.
देखो तन सम और कृतघ्नी, नाहिं सुन्यो जगमाहीं;
मृत्युसमय में ये ही परिजन, सब ही हैं दुःखदाई. १४
यह सब मोह बढावन हारे, जियको दुरगति – दाता;
इनसे ममत निवारो जियरा, जो चाहो सुख – साता.
मृत्यु – कल्पद्रुम पाय सयाने, मांगो इच्छा जेती;
समता धरकर मृत्यु करो तो, पावो संपत्ति तेती. १५
चौ आराधन सहित प्राण तज, तौ ये पदवी पावो;
हरि प्रतिहरि चक्री तीर्थेश्वर, स्वर्ग – मुक्ति में जावो.
मृत्यु – कल्पद्रुम सम नहिं दाता, तीनों लोक मंझारे;
ताको पाय कलेश करो मत, जन्म-जवाहर हारे. १६