१८२ ][ श्री जिनेन्द्र
इस तनमें क्या राचै जियरा, दिन-दिन जीरन हो है;
तेज कान्ति-बल नित्य घटत है, या सम अथिर सु को है.
पांचों इन्द्री शिथिल भई अब, सांस शुद्ध नहिं आवै;
तापर भी ममता नहिं छोडे, समता उर नहिं लावै. १७
मृत्युराज उपकारी जियको, तनसों तोहि छुडावै;
नातर या तनबंदीगृहमें, पडौ – पडौ बिललावै.
पुद्गलके परमाणु मिलकें, पिण्डरूप तन भासी;
ये तो मूरत मैं हूं अमूरत, ज्ञान – जेति गुन खासी. १८
रोग-शोक आदिक जो वेदन, ते सब पुद्गल लारे;
मैं तो चेतन व्याधि विना नित, हैं सो भाव हमारे.
या तनसों इस क्षेत्र – संबंधी, कारण आन बन्यो है;
खान – पान दे याको पोष्यो, अब सम भाव ठन्यो है. १९
मिथ्यादर्शन आत्म – ज्ञान बिन, यह तन अपनो जान्यो;
इन्द्री – भोग गिने सुख मैंने, आपो नाहिं पिछान्यो.
तन बिनसनतैं नाश जानि निज, यह अयान दुखदाई;
कुटुंब आदि को अपनो जान्यो, भूल अनादि छाई. २०
अब निज भेद जथारथ समझो, मैं हूँ जोति – सरूपी;
ऊपजै – विनसै सो यह पुद्गल, जान्यो याको रूपी.
इष्टऽनिष्ट जेते सुख – दुःख हैं, सो सब पुद्गल सागैं;
मैं जब अपनो रूप विचारो, तब वे सब दुःख भागैं. २१
बिन समता तनऽनंत धरे मैं, तिन में ये दुख पायो;
शास्त्रघाततेंऽनन्त बार मर, नाना योनि भ्रमायो.