स्तवनमाळा ][ १८३
बार अनंत हि अग्नि माहिं जर, मूवो सुमति न लायो;
सिंह व्याघ्र अहिऽनन्त बार मुझ, नाना दुःख दिखायो. २२
बिन समाधि ये दुःख लहे मैं, अब उर समता आई;
मृत्युराजकौं भय नहिं मानो, देवै तन सुखदाई.
यातैं जब लग मृत्यु न आवै, तब लग जप तप कीजै;
जप-तप बिन इस जगके मांहीं, कोई भी नहिं सीजै. २३
स्वर्ग-सम्पदा तपसों पावै, तपसों कर्म नसावै;
तप ही सों शिव – कामिनि-पति ह्वे, यासों तप चित लावै.
अब मैं जानी समता बिन मुझ, कोऊ नाहिं सहाई;
मात-पिता सुत-बांधव तिरिया, ये सब हैं दुखदाई. २४
मृत्यु समय में मोह करें ये, तातैं आरत हो है;
आरततैं गति नीची पावै, यों लख मोह तज्यो है.
और परिग्रह जेते जग में, तिनसों प्रीति न कीजै;
परभवमें ये संग न चालैं, नाहक आरत कीजै. २५
जे-जे वस्तु लखत हैं ते पर, तिनसों नेह निवारो;
परगति में ये साथ न चालैं, ऐसो भाव विचारो.
जो परभवमें संग चलै तुझ, तिनसों प्रीति सु कीजै;
पंच पाप तज, समता धारो, दान चार विध कीजै. २६
दशलक्षण – मय धर्म धरो हिय, अनुकम्पा उर लावो;
षोडशकारण नित्य विचारो, द्वादश भावन भावो.
चारों परवी प्रोषध कीजै, अशन रात को त्यागो;
समता धर दुरभाव निवारो, संयमसों अनुरागो. २७