१८४ ][ श्री जिनेन्द्र
अन्त समय में यह शुभ भाव हि, होवें आनि सहाई;
स्वर्ग – मोक्ष – फल तोहि दिखावें, ॠद्धि देहिं अधिकाई.
खोटे भाव सकल जिय त्यागो, उर में समता लाके;
जा सेती गति चार दूर कर, बसहु मोक्षपुर जाके. २८
मन थिरता करके तुम चिंतो, चौ – आराधन भाई;
ये ही तोकों सुखकी दाता, और हितू कोउ नाहीं.
आगें बहु मुनिराज भये हैं, तिन गहि थिरता भारी;
बहु उपसर्ग सहे शुभ पावन, आराधन उर धारी. २९
तिनमें कछु इक नाम कहूं मैं, सो सुन जिय चित लाके;
भावसहित अनुमोदै जो जन, दुर्गति होय न ताके.
अरु समता निज उरमें आवे, भाव अधीरज जावे;
यों निश दिन जो उन मुनिवरको, ध्यान हिये बिच लावे. ३०
धन्य-धन्य सुकुमाल महामुनि, कैसे धीरज धारी;
एक स्यालिनी जुग बच्चा – जुत, पांव भख्यो दुखकारी.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु-महोत्सव भारी. ३१
धन्य-धन्य जु सुकौशल स्वामी, व्याघ्रीने तन खायो;
तौ भी श्रीमुनि नेक डिगे नहिं, आतम सों हित लायो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३२
देखो गज – मुनिके शिर उपर, विप्र अगिनि बहु बारी;
शीश जलै जिम लकडी तिनको, तौ हू नाहिं चिंगारी.