स्तवनमाळा ][ १८५
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३३
सनतकुमार मुनी के तन में, कुष्ट वेदना व्यापी;
छिन्न-भिन्न तन तासों हूवो, तब चिंत्यों गुन आपी.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३४
श्रेणिक-सुत, गंगा में डूब्यो, तब ‘जिन’ नाम चितारो;
धर संलेखना परिग्रह छोड्यौ, शुद्ध भान उर धारो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३५
समंतभद्र मुनिवर के तनमें, क्षुधा – वेदना आई;
ता दुख में मुनि नेक न डिगियो, चित्यो निज गुन भाई.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३६
ललित घटादिक तीस – दोय मुनि, कौशांबी तट जानो;
नदीमें मुनि बहकर मूवे, सो दुख उन नहिं मानो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३७
धर्मघोष मुनि चंपानगरी, बाह्य ध्यान धर ठाढो;
एक मासकी कर मर्यादा, तृषा – दुःख सह गाढो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३८