१८६ ][ श्री जिनेन्द्र
श्रीदत्त मुनिको पूर्व जन्मका, वैरी देव सु आके;
विक्रिय कर दुःख शीत – तनो जो, सह्यो साधु मन लाके.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ३९
वृषभसेन मुनि उष्ण शिला पर, ध्यान धरो मन लाई;
सूर्य – धाम अरु उष्ण पवनकी, वेदन सहि अधिकाई.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४०
अभयघोष मुनि काकन्दीपुर, महावेदना पाई;
वैरी चंडने सब तन छेद्यो, दुख दीनो अधिकाई.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४१
विद्युतचरने बहु दुख पायो, तौ भी धीर न त्यागी;
शुभ भावनसों प्रान तजे निज, धन्य और बडभागी.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४२
पुत्र – चिलाती नामा मुनिको, वैरीने तन घाता;
मोटे – मोटे कीट पडे तन, तापर निज – गुन राता.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४३
दंडक नामा मुनिकी देही, बाणन कर अरि भेदी;
ता पर नेक डिगे नहिं वे मुनि, कर्म – महारिपु छेदी.