स्तवनमाळा ][ १८७
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४४
अभिनंदन मुनि आदि पांचसौ, घानी पेली जु मारे;
तौ भी श्रीमुनि समता धारी, पूरव कर्म विचारे.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४५
चाणक मुनि गौघर के मांहीं, मूंद अगिनि परजाल्यो;
श्रीगुरु उर सम – भाव धारकै, अपनो रूप सम्हाल्यो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४६
सात शतक मुनिवर दुख पायो, हथिनापुर में जानो;
बलि ब्राह्मण – कृत घोर उपद्रव, सो मुनिवर नहिं मानो.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तौ तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४७
लोहमयी आभूषण गढके, ताते कर पहराये;
पांचों पांडव मुनिके तन में, तो भी नाहिं चिगाये.
यह उपसर्ग सह्यो धर थिरता, आराधन चित धारी;
तो तुमरे जिय कौन दुःख है? मृत्यु – महोत्सव भारी. ४८
और अनेक भये इस जग में, समता – रस के स्वादी;
वे ही हमको हों सुखदाता, हरिहं टेव प्रमादी.
सम्यक्दर्शन – ज्ञान – चरण तप, ये आराधन चारों;
ये ही मोको सुखके दाता, इन्हें सदा उर धारों. ४९