Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८८ ][ श्री जिनेन्द्र
यों समाधि उर माहीं लावो, अपनो हित जो चाहो;
तजि ममता अरु आठों मदको, ज्योतिसरूपी ध्यावो.
जो कोई नित करत पयानो, ग्रामांतर के काज;
सो भी सगुन विचारै नीके, शुभके कारण साजे. ५०
मातपितादिक सर्व कुटुंब मिलि, नीके शकुन बनावैं;
हलदी धनिया पुंगी अक्षत, दूध दही फल लावैं.
एक गाम जावनके के कारण, करें शुभाशुभ सारे;
जब परगतिको करत पयानो, तब नहिं सोचो प्यारे. ५१
सर्व कुटुंब जब रोवन लागै, तोहि रुलावें सारे;
ये अपशकुन करे सुन तोकों, तू यों क्यों न विचारे.
अब परगतिको चालन बिरियां, धर्मध्यान उर आनो;
चारों आराधन आराधो, मोहतनों दुःख हानो. ५२
होय निःशल्य तजो सब दुविधा, आतमराम सुध्यावो;
अब परगति को करहु पयानो, परमतत्त्व उर लावो.
मोहजाल को काट पियारे, अपनो रूप विचारो;
मृत्युमित्र उपकारी तेरो, यों निश्चय उर धारो. ५३
(दोहा)
‘मृत्युमहोत्सवपाठ’कों, पढेंसुनो बुधिवान;
सरधा धर नित सुख लहें, ‘सूरचंद’ शिवथान.
पंच उभय नव एक शुभ, संवत सो सुखदाय;
अश्विन श्यामा सप्तमी, कह्यो पाठ मन लाय. ५४