स्तवनमाळा ][ १८९
स्तवन
(राग – काफी)
आपा प्रभु जाना मैं जाना – टेक.
परमेसुर यह, मैं इस सेवक,
एसो भर्म पलाना — आपा० १
जो परमेसुर सो मम मूरति,
जो मम सो भगवान;
मरमी होई तो जान,
जानै नाहीं आना — आपा० २
जाकौ ध्यान धरत हैं मुनिगन;
पावत हैं निरवाना;
अर्हंत सिद्ध सूरि गुरु मुनिपद,
आतमरूप बखाना — आपा० ३
जो निगोदमें सो मुझमाहीं,
सोई है शिव थाना;
‘द्यानत’ निहचै रंच फेर नहिं,
जानै सो मतिवाना — आपा० ४
स्तवन
(राग – मारु)
जो जो देख्यो वीतरागने सो सो होसी वीरा रे!
बिन देख्यो होसी नहिं क्यों ही, काहे होत अधीरा रे. जो०