१९० ][ श्री जिनेन्द्र
समय एक बढे नहिं घटसी, जो सुख दुःखकी पीरा रे,
तू क्यों सोच करै मन कूडो, होय वज्र ज्यों हीरा रे. जो०
लगै न तीर कमान वान कहुं, मार सकै नहिं मीरा रे,
तू सम्हारि पौरुष बल अपनो, सुख अनंत तो तीरा रे. जो०
निश्चय ध्यान धरहुं वा प्रभुको, जो टारै भवभीरा रे,
‘भैया’ चेत धरम निज अपनो, जो तारै भव – नीरा रे. जो०
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श्री सीमंधार जिन – स्तवन
(तरकारी ले लो....‘मालण’)
सीमंधर स्वामी! वेग पधारो सुवरण धाममें.....
नैन-सिंहासन बिछा खडे प्रभु! स्वागत हित हम तेरे.
आओ आओ मनमंदिरमें, नाथ खुले पट मेरे...
सीमंधर स्वामी....१
विदेहक्षेत्रमें धर्मामृतकी आप सुवर्षा करते,
हम चातकवत् तरस रहे हैं, क्यो नहि विपदा हरते....
सीमंधर स्वामी....२
कुंदकुंद जिन भक्त कहानको, तुमने यहां भिजवाया,
ज्ञानज्योति प्रकटाकर पावन, मिथ्या मोह भगाया....
— किन्तु नाथ तुम स्वयम् न आये, क्या है चूक हमारी.
स्वर्णनगर ‘सौभाग्य’ दर्श दे, पूरो आश हमारी....
सीमंधर स्वामी...३-४