स्तवनमाळा ][ १९१
श्री नेमप्रभुने – विनति
(तू ही है पारस प्यारा रे)
मुझको छोड चले गिरनार....वल्लभ यह कैसी ठानी रे....
वल्लभ....
गर गिरनार तुम्हें जाना था, दुल्हा रूप धर क्यों आना था,
क्यों यादवकुल संग लाना था, धूम मचानी रे.....
वल्लभ यह....१
जब पशुओंका छोडा घेरा, फिर क्यों रथ तोरणसे फेरा,
तुम चरणों बिन मुझे बसेरा, कहां सुज्ञानी रे...बसेरा....२
नौ भवकी मैं दासी तिहारी, दयाद्रष्टि क्यों फिरी तुम्हारी,
कहो भई क्या चूक हमारी, बता निशानी रे. हमारी....३
जब पशुओं पर करुणा करते, कहो क्यों न दुःख मेरा हरते,
क्यों नहि साथ मुझे ले चलते कैसी ठानी रे.....प्रभु यह ४
तुम बिन कैसे नाथ रहूंगी, क्या क्या जगके बोल सहूंगी,
किससे मनकी बात कहूंगी, जुडे कहानी रे....कहूंगी....५
राजुल का ‘सौभाग्य’ यही है, तारोगे भव आश सही है,
यातें आकर शरण गही है, केवलज्ञानी रे....गही है....६
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