२०२ ][ श्री जिनेन्द्र
श्री वीर जिन – स्तवन
(बैजू बावरा – दूर कोई गाये)
वीर छवि भाये अरु न सुहाये, ओ द्रग बसिया रे,
मुक्ति सांवरिया रे. टेक.
मन में छाई ज्योति तुम्हारी, पाप तिमिर सब खोये
अजी हांजी प्रभु! पाप तिमिर सब खोये;
ज्ञानसुधाकी लहरें दौडी, मन मिथ्या – मल धोये,
अजी हांजी प्रभु! मन मिथ्या – मल धोये;
सुचिता पाये, मन ललचाये, ओ द्रग बसिया रे,
मुक्ति सांवरिया रे. १
पर की ममता त्याग हृदय से, आतम द्रव्य पिछाना,
अजी हांजी प्रभु! आतम द्रव्य पिछाना;
सहजानंदी शुद्ध स्वरूपी, अपना कर निज बाना,
अजी हांजी प्रभु! अपना कर निज बाना;
निज पद पायें, भ्रमण नशायें, ओ द्रग बसिया रे. २
मुक्ति सांवरिया रे. २
जो तूं है सो मैं हूं भगवन्, इसमें न बात नई है;
अजी हांजी प्रभु! इसमें न बात नई है,
जीवनमें ‘सौभाग्य’ मिला है अब कुछ ढील नहीं है,
अजी हांजी प्रभु! अब कुछ ढील नहीं है;
करम नशायें सिद्ध कहायें, ओ द्रग बसिया रे.
मुक्ति सांवरिया रे. ३