श्री जिन – स्तवन
(ॠषभ जिणंद शुं प्रीतडी – राग)
परमातम परमेश्वरु,
परवस्तुथी हो अलिप्त छो नाथ के,
द्रव्ये द्रव्य मिले नहीं,
भावे पण हो अव्याप्त छे अन्य के;
श्री सीमंधर साहिबा.
शुद्ध स्वरूप सनातनो,
प्रभु निर्मळ हो निःसंग स्वरूप के;
आत्मविभूतिए परिणम्यो,
न करे हो ते परनो संग के. — श्री०
प्रभु जाणुं जन्म कृतार्थ छे,
भावे मीलवुं हो प्रभु साथे आज के;
प्रभु तो स्वसंपत पामीया,
शुद्ध स्वरूपे हो प्रणम्या छो नाथ के. — श्री०
स्व स्वरूप एकत्वता,
जे साधे हो प्रभु पूर्णानंद के;
रमे भोगवे आतमा,
रत्नत्रयी हो प्रभु गुणनो वृंद के. — श्री०
प्रभु वीतरागी आलंबने,
अमे पामीए हो परमानंद विलास के;
स्तवनमाळा ][ २०९