निज परणति दल साजि स्वबल करि,
विधि को मार गिराया है;
केवलज्ञान सुथान आपनो,
वीर वीर पद पाया है;
समवसरन विधि रची शची पति,
सुरसमूह सब आया है;
भूचर खेचर नर पशु सबही,
जिन दरशनको धाया है.
धर्मामृत वरषाय जगतको,
विधि – विष विषम नसाया है;
मोह – जनित निद्राको हरिकें,
भवि शिव पंथ लगाया है;
करि विहार पावापुर वनते,
शिव – मंदिरको धाया है;
ऐसे वर्धमान जिनवरको,
सुर नर शीस नमाया है.
श्रीमत सन्मति शुभमति दाता,
तुम गुण पार न पाया है;
वर्धमान महावीर वीर अति,
नाम बहुत श्रुत गाया है;
करुणानिधि प्रतिपाल जगत के,
अधम उधार कहाया है;
स्तवनमाळा ][ २५१