गणनायक रिषि मुनि सब हारे,
सहस चक्षु ललचाया है.
जिनके गर्भ – जन्म – तप मांही,
सुरसमूह सब आया है;
साधि नियोग योग सब करि कै,
निज निज शीस नवाया है.
बाल समय मदभंजन मदको,
कोटि अनंग लजाया है;
दिव्य सरूप निरखि सुर सुरपति,
शिवतिय मन ललचाया है.
हित मित – वचन सुधासम जिनके,
सुनत श्रवण सुख पाया है;
दिव्य सुगंध अंगकी शोभा,
निरखि द्रगन मन भाया है;
भविजन – कमल प्रकाशन सूरज,
वज्र स्वरूपी काया है;
वचन – किरण करि भ्रमतम नाशौ,
वृष – मारग दरशाया है.
विधि – अरिके वश परौ जगत लखि,
मन करुनामें आया है;
मोह अरीके नाश करनको,
वीररूप दरशाया है.
२५० ][ श्री जिनेन्द्र