गणराज तुमें नित ध्यावत हैं, सुरराज सुपूज रचावत हैं;
उपशांत स्वभाव पशू वरतें, अरिभाव करें न कली परतें.
तुमरे पदपंकजमें वसिकें, अरु इन्द्रिय – मन – तनको कसिकें;
विधिकर्म अरीदल में घसिकें, निज राज लियो निजमें वसि है.
तुम दीनदयाल कहावत हो, करुणानिधि नाम लहावत हो;
हमरे उरमांही रहावत हो, फिर क्यों जगमें भरमावत हो.
जगमें तुमही इक मालिक हो, सरनागत के प्रतिपालक हो;
तुमरे पदकी हम आस गही, मम वास करो निज पास सही.
(दोहा)
मुनिसुव्रत महाराजजी, सदा तुमारी आस,
मन वच शीश नवाईकें, नमैं जिनेश्वरदास.
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श्री वर्धामान जिन – स्तवन
(छंदः त्रिभंगी)
जय जय जगतारी शिव हितकारी,
अनिवारी वसु कर्म हरो;
मम अरज सुनीजै ढील न कीजै,
शिवसुख दीजै दया करो.
(छंदः कुसुमलता)
जयवंतौ जगमांहि जगतपति,
तुम गुण पार न पाया है;
स्तवनमाळा ][ २४९