वसु प्रातिहारज सहित राजैं करत सुरनर सेवजी;
जग तरनतारन सरन मैंने लई तुम पद
तुम पद मेरे उर बसो, सदा सधारो काज.
प्रभु तुम गण गाऊं चरन मनाऊं शिवसुख पाऊं जस लीजै.
वसु कर्म अरीगण
अरिविघ्न गयंदनको हरिहो, सुखसंपतिको क्षणमें भरि हो.
समवसृतमांहि विराजत है, प्रतिहारजकी छबि छाजत है;
त्रय छत्र सु चौसठ चंवर ढरै, नभमें सुर दुन्दुभि घोर करै.
चहुं ओरन तैं सुर आवत हैं, बहु भक्ति भरे गुन गावत हैं;
जिनके पदको सिर नावत हैं, तिनके नित मंगल गावत हैं.