जिनके गर्भ कल्याणमाहीं सब सुरासुर आईयो,
जिन मातपितुको हर्षयुत शुचि नीर न्हवन कराईयो.
जिनवर जन्ममझार महोत्सव हरि कियो,
कनकाचलके शीश न्हवन उत्सव कियो;
सुर किन्नर गंधरव सुगुण धुनि बाजही,
जै जै शब्द अनुपम दुन्दुभि बाजही.
वाजंति बाजे नचहि सुरतिय भक्ति हिरदे विस्तरी,
निज जन्म मनमें सफल जानों जबहि जिनधुनि उच्चरी,
सुरपति सहसकर कनक कलसा आठ अधिक सुहावने,
भरि क्षीरसागर नीर निर्मल भक्तियुत हरि पावने.
श्रीजिनवरके शीश कलश — धारा ढरी,
दुन्दुभि शब्द गहीर सुरन जै जै करी;
पांडुक वनके मांहि न्हवनजल विस्तरो,
उमगो वारिप्रवाह सुनंदन वन परयो.
वन भद्रसालविषै सु पहुंचो जल पवित्र अनूप है,
सुरनर पवित्र सुकरन उज्ज्वल तीर्थ सम शुचि रूप है;
करि जन्म उत्सव सकल सुर खग हरषयुत निजथल गए,
जिनराज अरह अनंतबल षटखंडपति चक्री भए.
कछु कारनकों पाय प्रभू वैरागियो,
तजो राजको साज जाय बन तप लियो.
घाति करम कर नास प्रभू केवल लियो,
समवसरनविधि रची इन्द्र हरषित भयो.
स्तवनमाळा ][ २४७