अरिमोह करीको हरिसमान, तुम विघ्न विदारण अचल जान.
तुम पद सरोजकी भक्ति सार, नित करैं सुरासुर बुधि उदार,
रिषि मुनि महंत तुम नाम धार, भवसागरतें होवैं सुपार.
इत्यादि अतुल गुणगण अनंत, गणधर नहि पावै कहत अंत,
तौ अल्पमती नर और कोय, तुम गुणसमुद्र किम पार होय.
मैं सरनागत आयो कृपाल, भवसागरतें मोकूं निकाल,
मैं डूबत हूं भवसिंधुमांहि, जिनराज कृपाकर गहो बांह.
जबलों जगवास रहै जिनेश, जबलौं अरिकर्म करैं कलेश,
तबलौं तुम चर्न हृदे हमेश, मम वास रहौ सुनिये महेश.
यह अरज हमारी सुनों सार, मैं नमत सदा कर शीश धार,
तुम जगनायक सिरदार सार, संसार खारतैं करौ पार.
विबुधांगना जिनमातुजीकी रहैं नित प्रति सासनी;