तुम नीतिनिपुन विन रागदोष, शिवमग दरशावतु हो अदोष,
तुम्हरे ही नामतने प्रभाव, जगजीव लहें शिव-दिव सुराव. ६
तातैं मैं तुमरी शरण आय, यह अरज करतु हों शीश नाय,
भव बाधा मेरी मेट मेट, शिवराधासों करि भेट भेट. ७
जंजाल जगतको चूर चूर, आनंद अनूपम पूर पूर,
मति देर करो सुनि अरज एव, हे दीनदयाल जिनेश देव. ८
मोकों शरणा नहि और ठौर, यह निहचै जानों सुगुन मौर,
‘‘वृन्दावन’’ वंदत प्रीति लाय, सब विघन मेटिये धरम-राय. ९
श्री कुंथुनाथ जिन – स्तवन
(दोहा)
छठवें चक्रपती प्रभू, सत्रहवें तीर्थेश,
करौ कृपा मुझ दीन पर, हरौ कर्म परमेश.
(छन्द पद्धरी)
जै जै जिन कुन्थु दयाल देव, तुम चरननकी हम करत सेव,
तुम ब्रह्म चिदंग अनंगरूप, तुम बुद्ध विदित संवर स्वरूप.
जै जै पद अज अंकित महान, तुम हौ जगतारन तरन जान,
तुम असरन सरन सहाय देव, तुम कृपासिंधु सुखदाय देव.
तुम तत्त्वप्रकाशी रवि महान, तुमही प्रभु अनुपम चंद्र जान,
जिनवचन चंद्रिका सुखद सार, भवताप निवारन सुधासार.
तुम कल्पवृक्ष दाता महान, बिनजाचत द्यो निजको निधान,
तुम चिंतामणिसे अधिक देव, बिन चिंतत भविजनको स्वमेव.
स्तवनमाळा ][ २४५