जै नवकेवल प्राप्त नमस्ते, नव पदार्थथिति आप्त नमस्ते,
दशों धरम धरतार नमस्ते, दशों बंध परिहार नमस्ते. ८
विघ्न – महीधर – विज्जु नमस्ते, जै उरधगति रिज्जु नमस्ते,
तन कनकद्युति पूर नमस्ते, ईक्ष्वाकजगत – सूर नमस्ते. ९
धनु पचास तन उच्च नमस्ते, कृपासिंधु गुण शुच्च नमस्ते,
सेही – अंक निशंक नमस्ते, चितचकोर मृग अंक नमस्ते. १०
राग – दोष – मद टार नमस्ते, निज – विचार दुखहार नमस्ते,
सुर सुरेश-गणवंद नमस्ते, ‘वृंद करो सुखकंद नमस्ते. ११
श्री धार्मनाथ जिन – स्तवन
(छंद पद्धरी)
जय धरमनाथ जिन गुणमहान, तुम पदको मैं नित करों ध्यान,
जय गरभ जनम तप ज्ञानजुक्त, वर मोक्ष सुमंगल सर्म-भुक्त. १
जय चिदानन्द आनन्दकंद, गुनवृन्द सु ध्यावत मुनि अमन्द,
तुम जीवनि के विनु हेत मित्त तुम ही हो जग में जिन पवित्त. २
तुम समवसरण में तत्त्वसार, उपदेश दियो है अति उदार,
ताकों जे भवि निज हेत चित्त, धारैं ते पावैं मोक्ष वित्त. ३
मैं तुम मुख देखत आज पर्म, पायो निजआतमरूप धर्म,
मोकों अब भौभयतैं निकार, निरभयपद दीजे परमसार. ४
तुम सम मेरो जगमें न कोय, तुमहीतै सब विधि काज होय,
तुम दयाधुरन्धर धीर वीर, मेटो जगजन की सकल पीर. ५
२४४ ][ श्री जिनेन्द्र