Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

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श्री सीमंधर जिनस्तवन
एम ढुंढतां रे धर्म सोहामणो,
मिलिया सद्गुरु एक;
तेणे साचो रे मारग दाखव्यो;
आणी हृदय विवेक......
श्री सीमंधर साहिब! सांभळो.......१
परघर जोतां रे धर्म तुमे फरो,
निजघर न लहो रे धर्म;
जिम नवि जाणे रे मृग कस्तूरीयो,
मृगमद परिमलमर्म.......श्री० २
जिम ते भूलो रे मृग दिशिदिशि फरे;
लेवा मृगमदगंध;
तिम जग ढुंढे रे बाहिर धर्मने,
मिथ्याद्रष्टि रे अंध......श्री० ३
जातिअंधनो रे दोष न आकरो,
जे नवि देखे रे अर्थ;
मिथ्याद्रष्टि रे तेहथी आकरो,
माने अर्थ अनर्थ.......श्री० ४
आप प्रशंसे रे परगुण ओलवे,
न धरे गुणनो रे लेश;
१३२ ][ श्री जिनेन्द्र