श्री सीमंधर जिन – स्तवन
(राग – शांतिजिन एक मुज विनंती)
एणी परे में प्रभु विनव्यो, सीमंधर भगवंतो रे;
जाणुं हुं ध्याने प्रगट हुतो, केवल-कमलानो कंतो रे...
ज्यो ज्यो जगगुरु जय धणी. १
तुं प्रभु हुं तुज सेवको, ए व्यवहार विवेको रे;
निश्चयनय नहि आंतरो, शुद्धातम गुण एको रे.....
ज्यो० २
जिणे आराधन तुज कर्युं, तस साधन कुण लेखे रे;
दूर देशांतर कुण भमे, जे सुरमणि घर देखे रे.....
ज्यो० ३
अगम अगोचर नय-कथा, पार कुणे नवि लहीए रे...
तेणे तुज शासन एम कह्युं, बहुश्रुत-वयणडे रहीए रे...
ज्यो० ४
तुं मुज एक हृदये वस्यो, तुंही ज पर उपगारी रे;
भरत-भविक-हित-अवसरे, मुज मत मेलो विसारी रे..
ज्यो० ५
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स्तवन मंजरी ][ १३१