Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 130 of 438
PDF/HTML Page 148 of 456

 

background image
महा मोह भेदी, अमायी अवेदी,
तथागत तथारूप भव तरु-उच्छेदी.
निरातंक निकलंक निरमल अबंधो,
प्रभो दीनबंधो कृपानीर सींधो;
सदातन सदाशिव सदा शुद्ध स्वामी,
पुरातन पुरुष पुरुषवर वृषभगामी.
प्रकृति रहित हित वचन मायातीत,
महाप्राज्ञ मुनियज्ञ पुरुष प्रतीत;
दलित कर्मभर कर्मफल सिद्धिदाता,
हृदय पूत अवधूत नूतन विधाता.
महाज्ञान योगी महात्मा अयोगी,
महा धर्म संन्यास वर लच्छी भोगी;
महा ध्यान लीनो समुद्रो अमुद्रो,
महा शांत अतिदांत मानस अरुद्रो.
महेंद्रादिकृतसेव देवाधिदेव,
नमो ते अनाहत चरण नित्यमेव;
जगन्नाथ जगदीश जगबंधु नेता,
चिदानंद चित्कंद चिन्मूर्ति चेता.
❋ ❋ ❋
१३० ][ श्री जिनेन्द्र