Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

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तजी भोग लई योग चारित्र पाळे,
धरी ध्यान अध्यात्म घनघाति टाळे;
लहे केवलज्ञान सुर कोडि आवे,
समवसरण मंडाई सवि दोष जावे.
घटे द्रव्य जगदीश अवतार ऐसो;
कहो भाव जगदीश अवतार कैसो!
रमे अंश आरोप धरी ओघद्रष्टि;
लहे पूर्ण ते तत्त्व जे पूर्णद्रष्टि.
त्रिकालज्ञ अरिहंत जिन पारगामी,
विगतकर्म परमेष्ठी भगवंत स्वामी;
प्रभु बोधिदायक आप्त स्वयंभू,
ज्यो देव तीर्थंकरो तूं ज शंभु.
इस्यां सिद्धजिननां कह्यां सहस्र नाम,
रहो शब्द-झगडो लहो शुद्ध धाम;
श्री जिनराज बुध चरण सेवी,
कहे शुद्धपदमांहि निज द्रष्टि देवी.
जिनेन्द्रस्तवन
(भुजंगप्रयात वृत्त)
जगन्नाथ जगदीश जगबंधु नेता,
चिदानंद चित्कंद चिन्मूर्ति चेता;
स्तवन मंजरी ][ १२९
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