तजी भोग लई योग चारित्र पाळे,
धरी ध्यान अध्यात्म घनघाति टाळे;
लहे केवलज्ञान सुर कोडि आवे,
समवसरण मंडाई सवि दोष जावे. २
घटे द्रव्य जगदीश अवतार ऐसो;
कहो भाव जगदीश अवतार कैसो!
रमे अंश आरोप धरी ओघद्रष्टि;
लहे पूर्ण ते तत्त्व जे पूर्णद्रष्टि. ३
त्रिकालज्ञ अरिहंत जिन पारगामी,
विगतकर्म परमेष्ठी भगवंत स्वामी;
प्रभु बोधिदायक आप्त स्वयंभू,
ज्यो देव तीर्थंकरो तूं ज शंभु. ४
इस्यां सिद्ध – जिननां कह्यां सहस्र नाम,
रहो शब्द-झगडो लहो शुद्ध धाम;
श्री जिनराज बुध चरण सेवी,
कहे शुद्धपदमांहि निज द्रष्टि देवी. ५
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जिनेन्द्र – स्तवन
(भुजंगप्रयात वृत्त)
जगन्नाथ जगदीश जगबंधु नेता,
चिदानंद चित्कंद चिन्मूर्ति चेता;
स्तवन मंजरी ][ १२९
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