Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भामंडळनी झलक, झबुके वीजळी रे, झबुके०
उन्नत आठ भूमि इन्द्र धनुष शोभा मिली रे. धनु०
देवदुंदुभिनो नाद, गंभीर गाजे घणुं रे, गं०
भाविक जीवनां नाटक, मोर क्रीडा भणुं रे; मोर०
चामर केरी हार, चलंती बगतती रे, च०
देशना वचन सुधारस, वरसे जिनपति रे. व०
समकीति चातकवृंद, तृप्ति पामे तिहां रे, तृ०
सकळ कषाय दावानळ, शांत होये जिहां रे; शा०
जिनचित्तवृत्ति सुभूमि, त्रेहाळी थई रही रे, त्रे०
तेणे रोमांच अंकुर, वती काया लही रे. वती०
श्रमणकृषीवल सज्ज, होये तव उज्जमी रे, हो०
गुणवंत जन मन-क्षेत्र, समारे संयमी रे; समा०
करता बीजाधान, सुधान निपावता रे, सुधा०
जेणे जगना लोक, रहे सहु जीवता रे. रहे०
गणधरगिरितट संगी, थई सूत्र गूंथना रे, थई०
एह नदी प्रवाहे, होये सहु पावना रे; होये०
एहि ज मोटो आधार, विषम काळे लह्यो रे, वि०
श्री जिनचरणनो दास, कहे में सद्ह्यो रे. क०
स्तवन मंजरी ][ १४५
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