Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

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श्री अजित जिनस्तवन
(म्हारो मुजरो लोने राज, साहेब शांति सलूणाए देशी)
अजित जिणेसर चरणनी सेवा, हेवा ए हुं हळियो;
कहिये अणचाख्यो पण अनुभव, रसनो टाणो मळियो,
प्रभुजी महेर करीने आज, काज हमारां सारो.
मुकाव्यो पण हुं नहि मूकुं, चूकुं ए नवि टाणो;
भक्ति-भाव ऊठ्यो जे अंतर, ते किम रहे शरमाणो.....
प्रभुजी०
लोचन शांत सुधारस सुभगा, मुख उपशांत प्रसन्न;
योग मुद्रा आतमरामी, अतिशयनो अति घन्न.....
प्रभुजी०
पिंड पदस्थ रूपस्थे लीनो, चरण-कमळ तुज ग्रहीयां;
भ्रमर परे रस स्वाद चखावो, विरसो कां करो महीयां...
प्रभुजी०
बाळ काळमां वार अनंती, सामग्रीए नवि जाग्यो;
यौवन काळे ते रस चाख्यो, तुं समरथ प्रभु माग्यो....
प्रभुजी०
तुं अनुभव-रस देवा समरथ, हुं पण अरथी तेहनो;
चित्त वित्त ने पात्र संबंधे अजर रह्यो हवे केहनो....
प्रभुजी०
१४६ ][ श्री जिनेन्द्र