Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रभुनी महेरे ते रस चाख्यो, अंतरंग सुख पाम्यो;
भक्तिथी सेवक एम भावे, हुओ मुज मन कामो....
प्रभु०
श्री जिनेश्वरस्तवन
(देव तुज सिद्धांत दीठेए देशी)
सकल समता सरलतानो, तुंही अनोपम कंद रे,
तुंही कृपारस कनककुंभो, तुंही जिणंद मुणिंद रे....
प्रभु तुंही, तुंही, तुंही, तुंही, तुंही धरतां ध्यान रे;
तुज स्वरूपी जे थया तेणे, लह्युं ताहरुं तान रे....प्रभु०
तुंही अलगो भव थकी, पण भविक ताहरे नाम रे;
पार भवनो तेह पामे, एह अचरीज ठाम रे......प्रभु०
जन्म पावन आज माहरो, नीरखीयो तुज नूर रे;
भवोभव अनुमोदनाजी, हुआ आप हजूर रे....प्रभु०
एह माहरे अखय आतम, असंख्यात प्रदेश रे;
ताहरा गुण छे अनंता, किम करुं तास निवेश रे....प्रभु०
एक एक प्रदेश ताहरे, गुण अनंततानो वास रे;
एम कही तुज सहज मिलत, हुवे ज्ञानप्रकाश रे....प्रभु०
ध्यान ध्याता ध्येय एक-भाव होये एम रे;
एम करतां सेव्यसेवक भाव होये क्षेम रे...प्रभु०
स्तवन मंजरी ][ १४७