एक सेवा ताहरी जो, होय अचल स्वभाव रे;
ज्ञान निर्मळ शोभित प्रभुता, होय आनंद जमाव रे..प्रभु० ७
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श्री सीमंधर जिन – स्तवन
(अजित जिन तारजो — राग)
निरुपाधिकता ताहरे रे, प्रभु रमणता ताहरे अनंत;
व्याप्य-व्यापता शुद्धता रे, सदा शुभ गुण विलसंत.....
सीमंधरजिन तारज्यो रे, तारज्यो दीनदयाळ; सीमंधर०
सेवक करो निहाल सीमंधर, ताहरो छे विसवास. सीमंधर०
तुं मोटो महाराज सीमंधर० तुं जीवजीवन आधार;
परमगुरु तारज्यो रे; उतारो भवपार. सीमंधर० १
द्रव्य रहित ॠद्धिवंत छो रे, प्रभु विकसित वीर्य अशोभ;
विगत कषाय वैरी हण्यो रे, अभिरामी ज्योति अलोभ,
सीमंधर० २
गुरु नहीं त्रिभुवन गुरु रे, तारक देवाधिदेव;
कर्ता भोक्ता निजतणो रे, सहज आणंद निमेव.
सीमंधर० ३
अनंत अक्षय अध्यातमी रे, प्रभु अशरीरी अनाहार;
सर्वशक्ति निरावर्णता रे, अतुल द्युति अनाकार.
सीमंधर० ४
१४८ ][ श्री जिनेन्द्र