Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 277-278.

< Previous Page   Next Page >


Page 149 of 297
PDF/HTML Page 173 of 321

 

लोकानुप्रेक्षा ]

[ १४९
जेण सहावेण जदा परिणदरूवम्मि तम्मयत्तादो
तं परिणामं साहदि जो वि णओ सो हु परमत्थो ।।२७७।।
येन स्वभावेन यदा परिणतरूपे तन्मयत्वात्
तं परिणामं साधयति यः अपि नयः सः खलु परमार्थः ।।२७७।।

अर्थःवस्तु जे काळे जे स्वभावे परिणमनरूप होय छे ते काळे ते परिणामथी तन्मय होय छे; तेथी ते ज परिणामरूप (वस्तुने) साधेकहे ते एवंभूतनय छे. आ नय परमार्थरूप छे.

भावार्थःजे धर्मनी मुख्यताथी वस्तुनुं जे नाम होय ते ज अर्थना परिणमनरूप जे काळे (वस्तु) परिणमे तेने ते ज नामथी कहे ते एवंभूतनय छे, तेने निश्चय (नय) पण कहेवामां आवे छे. जेम ‘गौ’ने चाले त्यारे ज गाय कहे पण अन्य काळे न कहे.

हवे नयोना कथनने संकोचे छेः

एवं विविहणएहिं जो वत्थुं ववहरेदि लोयम्हि
दंसणणाणचरित्तं सो साहदि सग्गमोक्खं च ।।२७८।।
एवं विविधनयैः यः वस्तु व्यवहरति लोके
दर्शनज्ञानचरित्रं सः साधयति स्वर्गमोक्षौ च ।।२७८।।

अर्थःजे पुरुष आ प्रमाणे नयोथी वस्तुने व्यवहाररूप कहे छेसाधे छेप्रवर्तावे छे ते पुरुष दर्शन-ज्ञान-चारित्रने साधे छे तथा स्वर्ग-मोक्षने साधे छे.

भावार्थःप्रमाण-नयथी वस्तुनुं स्वरूप यथार्थ सधाय छे. जे पुरुष प्रमाण-नयोनुं स्वरूप जाणी वस्तुने यथार्थ व्यवहाररूप प्रवर्तावे छे तेने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी तथा तेना फळरूप स्वर्ग-मोक्षनी सिद्धि थाय छे.

हवे कहे छे के तत्त्वार्थनुं श्रवण, ज्ञान, धारण अने भावना करवावाळा विरला छेः