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अर्थः — आ जीव कदाचित् रत्नत्रय पण पामे अने त्यां तीव्र कषाय करे तो, नाशने प्राप्त थयुं छे रत्नत्रय जेनुं एवो बनी, दुर्गतिमां गमन करे छे.
एवुं मनुष्यपणुं दुर्लभ छे एटला माटे (जीवने) रत्नत्रयनी प्राप्ति थाओ! एम कहे छेः —
अर्थः — जेम महान समुद्रमां पडी गयेलुं रत्न फरी पामवुं दुर्लभ छे तेम आ मनुष्यपणुं पामवुं दुर्लभ छे. – एवो निश्चय करी हे भव्यजीवो! आ मिथ्यात्व अने कषायने छोडो. एवो श्रीगुरुओनो उपदेश छे.
हवे कहे छे के – जो कदाचित् एवुं दुर्लभ मनुष्यपणुं पामी जीव शुभभावोथी देवपणुं पामे तो त्यां चारित्र पामतो नथीः —
अर्थः — अथवा मनुष्यपणामां कदाचित् शुभपरिणामोथी देव पण थाय अने कदाचित् त्यां सम्यक्त्व पण पामे तो त्यां तपश्चरण – चारित्र पामतो नथी. देशव्रत – श्रावकव्रत तथा शीलव्रत एटले ब्रह्मचर्य अथवा सप्तशीलनो लवलेश पण पामतो नथी.