Tattvagyan Tarangini-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१३८ ][ तत्त्वज्ञान-तरंगिणी
आत्मिक सुख तो निजवश निरुपम निःस्पृह नित्य निजस्थ अहो!
निरुपद्रव निर्द्रव्य अबंधाक विण भय शुभ अतकर्य लहो;
श्रेÌ अदोष अमल शिवहेतु दुर्लभ द्वन्द्वातीत ग्रहो,
आवुं सुख स्वात्मोत्थ लहो, ते विरुद्ध £न्द्रिय सुख न चहो. २.
अर्थ :धन (नी अपेक्षा) रहित, स्वाधीन, आत्मामां रहेलुं,
भयरहित, नित्य, निस्पृह, शुभ, द्वंद्वरहित, उपद्रवरहित, उपमा रहित,
बंधरहित तर्कथी पर सर्वोत्तम, मोक्षनुं कारण, दोष रहित, मळ रहित
जे केवळ दुर्लभ छे; एवुं स्व आत्मामांथी उत्पन्न थतुं सुख छे अने
इन्द्रियजन्य सुख तेनाथी विरुद्ध छे. २.
वैराग्यं त्रिविधं निधाय हृदये हित्वा च संगे त्रिधा
श्रित्वा सद्गुरुमागमं च विमलं धृत्वा च रत्नत्रयं
त्यक्त्वान्यैः सह संगतिं च सकलं रागादिकं स्थानके
स्थातव्यं निरुपद्रवेऽपि विजने स्वात्मोत्थसौख्याप्तये
।।।।
भव तन भोग प्रति Òदये वैराग्य धारी तजी संग त्रिधाा,
सद्गुरु ते निर्मल श्रुत भजतां, रत्नत्रयने धाारी मुदा;
अन्य जीवोनी संगति तेमज रागादि तजी सघाळाने,
सुख स्वात्मोत्थ चहे ते वसता निर्जन निरुपद्रव स्थाने. ३.
अर्थ :पोताना आत्मामांथी उत्पन्न थतुं सुख मेळववा माटे
हृदयमां (संसार, शरीर अने भोग प्रत्ये तेमज मन वचन कायाथी)
त्रिविध वैराग्य धारण करीने चेतन, अचेतन, मिश्र एम त्रण प्रकारनो
परिग्रह छोडीने सद्गुरुनो अने निर्दोष सत्शास्त्रनो आश्रय करीने,
रत्नत्रय धारण करीने, अन्य साथेनो संग तथा समस्त रागादि भावो
तजीने उपद्रवरहित निर्जन स्थानमां रहेवुं जोईए. ३.
खसुखं न सुखं नृणां किंत्वभिलाषाग्निवेदनाप्रतीकारः
सुखमेव स्थितिरात्मनि निराकुलत्वाद्विशुद्धपरिणामात् ।।।।