Tattvagyan Tarangini-Gujarati (Devanagari transliteration).

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अध्याय-१७ ][ १३९
£न्द्रियसुख सुख नहि पण £च्छा-अग्नि-व्यथा ए शांत करे,
शुद्ध परिणति निराकुळ जे आत्मस्थिति सुख ते ज खरे. ४.
अर्थ :इन्द्रियसुख ए मनुष्योनुं सुख नथी, परंतु इच्छारूप
अग्निनी वेदनाने शमाववानो उपाय छे. आत्मामां (जे) स्थिति छे ते,
निराकुळता होवाथी तथा विशुद्ध परिणाम होवाथी सुख ज छे. ४.
नो द्रव्यात्कीर्तितः स्याच्छुभखविषयतः सौधतूर्यत्रिकाद्वा
रूपादिष्टागमाद्वा तदितरविगमात् क्रीडनाद्यादृतुभ्यः
राज्यात्संराजमानात् वलवसनसुतात्सत्कलत्रात्सुगीतात्
भूषाद् भूजागयानादिह जगति सुखं तात्त्विकं व्याकुलत्वात्
।।।।
नह{ द्रव्यथी ते सत्सुख कांइ, के नहि ते कीर्तिथी मळे,
£न्द्रियरम्य विषयथी नहि, के जलसाथी महेल तळे;
मनोज्ञ £ष्ट प्राप्तिथी ते नहि, तेम अनिष्ट वियोगे नह{;
सुंदर रुप क्रीMा रमणीय ´तु राज्य राज सन्माने नह{
वस्त्र पुत्र स्त्री भूषण गीतो तरुगिरि वाहन सेवामां,
नह{ जगतमां तात्त्विक सुख तो मळे मात्र आकुळता त्यां. ५.
अर्थ :द्रव्यथी, कीर्तिथी, मनोज्ञ इन्द्रियना विषयोथी अथवा
राजमहेल, जलसा, नृत्य, गीत, वाजिंत्र ए त्रणेथी अथवा सुंदर रूपथी,
इष्टनी प्राप्तिथी अने अनिष्टना त्यागथी, क्रीडा आदि करवाथी, अनुकूळ
ॠतुओथी, राज्यथी, राजसन्मानथी, सेना, वस्त्र के पुत्र-पुत्रीथी, अनुकूळ
स्त्रीथी, मधुर गीतथी, भूषणोथी, वृक्ष, पर्वत के वाहनथी आ जगतमां
तात्त्विक सुख थतुं नथी. केम? (कारण के) ते सर्वमां व्याकुळता रहेली
छे तेथी. ५.
पूरे ग्रामेऽटव्यां नगरशिरसि नदीशादिसुतटे
मठे दर्यां चैत्योकसि सदसि रथादौ च भवने
महादुर्गे स्वर्गे पथनमसि लतावस्त्रभवने
स्थितो मोही न स्यात् परसमयरतः सौख्यलवभाक्
।।।।