अध्याय-१७ ][ १४१
ज्ञेय पदार्थो जाणे देखे सिद्ध तथा संसारी छतां,
संसारीनुं ज्ञान विकल्पक, सिद्धतणुं अविकल्पक त्यां. ८.
अर्थ : — सिद्ध आत्माओने, संसारी जीवोने, ज्ञेय पदार्थनुं दर्शन
ज्ञान थाय छे, पण सिद्धोने ते ज्ञान दर्शन विकल्परहित होय छे अने
संसारीओने (ते) विकल्प सहित होय छे. ८.
व्याकुलः सविकल्पः स्यान्निर्विकल्पो निराकुलः ।
कर्मबंधोऽसुखं चाद्ये कर्माभावः सुखं परे ।।९।।
निर्विकल्प तो निराकुल ने व्याकुल विकल्पवंत सदा,
कर्मनाश सत्सौख्य प्रथमने, कर्म-दुःखयुत अन्य बधाा. ९.
अर्थ : — विकल्प सहित जीव दुःखी होय छे अने निर्विकल्प
जीव सुखी होय छे. प्रथम (सविकल्प)ने कर्मनो बंध थाय छे अने
दुःख थाय छे. बीजाने ( – निर्विकल्पने) कर्मनो अभाव अने सुख थाय
छे. ९.
बहून् वारान् मया भुक्तं सविकल्पं सुखं ततः ।
तन्नापूर्वं निर्विकल्पे सुखेऽस्तीहा ततो मम ।।१०।।
पूर्वे ए सविकल्प सौख्य मx अनुभव्युं बहु वार अहा!
तेथी ते न अपूर्व मने तो निर्विकल्प सुख विषे स्पृहा. १०.
अर्थ : — सविकल्प सुख में घणीवार भोगव्युं छे, तेथी ते (मारा
माटे) अपूर्व नथी, तेथी मने निर्विकल्प सुख प्रत्ये स्पृहा छे. १०.
ज्ञेयज्ञानं सरागेण चेतसा दुःखमंगिनः ।
निश्चयश्च विरागेण चेतसा सुखमेव तत् ।।११।।
रागादियुत चित्त सहित जो जाणे ज्ञेय वस्तु दुःख तो;
पण जो जाणे चित्त-विरागे निश्चयथी जीवने सुख तो. ११,
अर्थ
: — रागयुक्त चित्तथी ज्ञेय पदार्थनुं ज्ञान प्राणीने दुःख