Tattvagyan Tarangini-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१४२ ][ तत्त्वज्ञान-तरंगिणी
आपे छे अने रागरहित मनथी ते ज्ञान सुख ज छे, ए निश्चय
छे. ११.
रवेः सुधायाः सुरपादपस्य चिंतामणेरुत्तमकामधेनोः
दिवो षिदग्धस्य हरेरखर्वं गर्वं हरन् भो विजयी चिदात्मा ।।१२।।
सूर्य सुधाा सुरतरु सुरमणि के सुरधोनु सुरसदन महा,
विष्णु आदिना गर्व हरे ए प्रबळ चिदात्मा विजयी अहा! १२.
अर्थ :हे आत्मन्! चैतन्यस्वरूप शुद्ध आत्मा सूर्यना,
अमृतना, कल्पवृक्षना, चिंतामणि रत्नना, उत्तम कामधेनुना, देवलोकना,
पंडितना, विष्णुना अखंडित गर्वने चकचूर करीने अखंड प्रतापवान वर्ते
छे. १२.
चिंता दुःखं सुखं शांतिस्तस्या एतत्प्रतीयते
तच्छांतिर्जायते शुद्धचिद्रूपे लयतोऽचला ।।१३।।
चिंता ए दुःख सुख शांति छे ए शांतिथी प्रतीत बने;
निर्मल चिद्रूपमां लय लाग्ये अचल शांति प्रगटे जीवने. १३.
अर्थ :चिंता ए दुःख छे, शांति ए सुख छे, आ वात
शांतिथी विचारतां प्रतीतिमां आवे छे. ते अचळ शांति शुद्ध चिद्रूपमां
लय लागवाथी प्रगट थाय छे. १३.
मुंच सर्वाणि कार्याणि संगं चान्यैश्च संगतिं
भो भव्य ! शुद्धचिद्रूपलये वांछास्ति ते यदि ।।१४।।
निर्मळ चिद्रूपमां लयनी जो वांछा छे हे भव्य! तने,
तो तज सर्व कार्य, बहिरंतर संग संगति अन्यजने. १४.
अर्थ :हे भव्य! जो शुद्ध चिद्रूपना लयनी तने इच्छा होय,
तो सर्व (बाह्य) कार्यो तथा परपदार्थोनो बाह्य अने अंतर संग तुं छोडी
दे. १४.