१४८ ][ तत्त्वज्ञान-तरंगिणी
हुं शुद्ध चिद्रूप एम स्मरतां भावमुक्त थवाय ज्यां,
आत्मा /मे करी तो पछी शुं द्रव्य मुकत न थाय त्यां;
क्षण क्षण मुकाये कर्मथी जीव शुद्ध चिद्रूप – चिंतने,
बंधााय ते परद्रव्य – चिंतनथी न संशय सुज्ञने. ८-९.
अर्थ : — जो आत्मा हुं शुद्ध चिद्रूप छुं एम स्मरण करीने
भावथी मुक्त थाय, तो क्रमे क्रमे ते द्रव्यथी मुक्त केम न थाय? ८.
शुद्ध चिद्रूपना चिंतनथी (जीव) क्षणे – क्षणे मुक्त थाय (छे) अने
तेनाथी बीजी चिंता करवाथी खरेखर ते बंधाय ज (छे); एमां संशय
नथी. ९.
सयोगक्षीणमिश्रेषु गुणस्थानेषु नो मृतिः ।
अन्यत्र मरणं प्रोक्तं शेषत्रिक्षपकैर्विना ।।१०।।
मिथ्यात्वेऽविरते मृत्या जीवा यांति चतुर्गतीः ।
सासादने विना श्वभ्रं तिर्यगादिगतित्रयं ।।११।।
गुणस्थान त्रीजे बारमे ने तेरमे मृत्यु नह{,
ना क्षपक श्रेणीमां मरण कıाãं अन्य गुणस्थानो मह{;
मिथ्यात्व अविरतिमां मरण थातां चर्तुगति जीव जता,
सासादने मृत्यु थतां विण नरक त्रण गति पामता. १०-११.
अर्थ : — तेरमा सयोग केवळी, बारमा क्षीणमोह अने त्रीजा
मिश्र गुणस्थानोमां मरण थतुं नथी. बीजां त्रण क्षपक श्रेणीना ८-९-
१० गुणस्थान विना बाकीना बीजा गुणस्थानोमां मरण थाय छे, एम
कह्युं छे. १०.
पहेला मिथ्यात्व गुणस्थानमां, चोथा अविरत सम्यक्त्व
गुणस्थानमां, मरण पामेला जीवो चार गतिमांनी कोई एक गतिमां जाय
छे, बीजा सासादन गुणस्थानमां मरण पामेला जीव नरक सिवाय,
तिर्यंच, मनुष्य ने देव ए त्रण गतिमांनी कोई एक गतिमां जाय छे. ११.